उपचुनावों ने शिवराज सिंह की चुनौतियां भी चार गुना बढ़ा दी–सरकार बचाने के लिए शिवराज देंगे अपनों की बलि..

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भोपाल ।(RJ)  कोरोना के संकट काल के प्रारंभ होते ही मध्यप्रदेश में कांग्रेस की कमलनाथ सरकार से बगावत कर 22 विधायकों के समर्थन से प्रदेश में बनी भारतीय जनता पार्टी की शिवराज सरकार कोरोना के खत्म होते ही इन 22 बागी विधायकों को जिताने के लिए जुट जाएगी .इन 22 विधायकों को जिताने की जितनी नैतिक जवाबदारी इनके नेता ज्योतिरादित्य सिंधिया की होगी ,उससे अधिक जवाबदारी मुख्यमंत्री शिवराज सिंह की भी होगी l क्योंकि यदि ये पूर्व विधायक उपचुनाव हार जाते हैं तो शिवराज सरकार का गिरना तय है l
इसलिए प्रदेश में चौथी बार सत्ता संभाल रहे शिवराज इन बागी नेताओं को जिताने में कोई कमी कसर नही छोड़ेंगे l शिवराज अपनी सरकार बचाने के लिए इन 22 विधायकों को जिताने के लिए अपनी ही पार्टी के उन नेताओं की बलि दे सकते हैं ,जो गत चुनाव(२०१८) में इन बागियों से हार गये थे l मतलब भाजपा नेताओं की बलि ले कर इन बागियों को विधानसभा में लाया जाएगा l उल्लेखनीय है कि शिवराज सिंह, कमलनाथ और ज्योतिरादित्य सिंधिया इन तीनों ही नेताओं की भविष्य की राजनीति इन 22 पूर्व विधायकों की जीत हार पर निर्भर करेगी l
कोरोना संक्रमण ने चौथी बार मुख्यमंत्री बने शिवराज सिंह की चुनौतियां भी चार गुना बढ़ा दी! पहली , कोरोना ऐसी अनजान मुसीबत है, जो दिखाई नहीं देती पर अपना लम्बा असर छोड़ रही है। दूसरी भाजपा में आये इन बागियों को उपचुनाव में जिताना है, तो तीसरी अपनी ही पार्टी के नेताओं के अन्तर्विरोध को सहना और उन्हें संतुष्ट करना और चौथी सरकार और पार्टी का समन्वय कर मंत्री पदों का वितरण करना l
शिवराज सिंह के लिए कहा भी जाता है कि शिवराज सिंह को विपरीत परिस्थितियों में सरकार चलाने और सटीक फैसले लेने का लम्बा अनुभव है! वे राजनीतिक हालात को बदलने का अच्छा माद्दा रखते हैं, इसे मानने वाले कम नहीं हैं! किन्तु, अभी के हालात ऐसे नहीं हैं कि वे एक फैसले से सबको खुश कर सकें।
शिवराज सिंह की राजनीतिक परिपक्वता के कई किस्से हैं। पहली बार सांसद से सीधे मुख्यमंत्री बनने को भी याद किया जाए, तो लगेगा कि उन्होंने शुरू से ही लोगों को चौंकाया है! किसी भी मंत्रिमंडल में मंत्री बने बिना वे सीधे मुख्यमंत्री बने थे और अब जनता के फैसले को उलटकर बागियों के कंधे पर सवार होकर चौथी बार सत्ता की सवारी करना । उनके कामकाज की शैली भी ऐसी है, कि वे नए राजनीतिक आइडिए उछालकर जनता को अपने पाले में ले आते हैं। लेकिन, अभी के जो हालात हैं, वो शायद उनके राजनीतिक जीवन का सबसे संकटकालीन समय है। मुख्यमंत्री बनने के साथ ही उनके सामने जो चुनौतियाँ आई, उन्हें कुशलता से उन्हें निपटाना ही होगा! वास्तव में ये उनकी अग्नि परीक्षा है, जिससे उन्हें अकेले ही जूझना है। कोरोना से निपटने के अलावा उन्हें उपचुनाव में जीत का भी माहौल बनाना है।
ज्योतिरादित्य सिंधिया के साथ कांग्रेस से बगावत करने वाले 22 बागी विधायको में 16 विधायक ऐसे हैं, जो ज्योतिरादित्य सिंधिया के इलाके ग्वालियर-चंबल इलाके से जीतकर विधानसभा में पहुंचे थे! लेकिन, पिछले विधानसभा चुनाव में भाजपा विरोधी लहर के बावजूद इनमें से गिने-चुने विधायक ही ऐसे हैं, जो बड़े अंतर चुनाव जीते! पार्टी बदलने के बाद अब वहाँ उपचुनाव में कोई बड़ा चमत्कार हो जाएगा, फिलहाल तो ऐसा दिखाई नहीं दे रहा! उल्ट पार्टी बदलने से इनकी साख पर भी असर गिरेगा और कांग्रेस गद्दार कह कर उनका रस्ता भी रोकेगीl
राजनैतिक हलकों में तो इस बात की भी फुसफुसाहट है कि शिवराज सिंह द्वारा कराये गये गोपनीय सर्वे में २२ में से ३ विधायक वापसी करेंगें , यानी १९ बागियों की हार तय है l
यूँ भी आकड़ों के आईने में भी सिंधिया समर्थक 22 बागी विधायक जिन विधानसभा सीटों से 2018 में चुनाव जीते थे, उनमें से 20 सीटें ऐसी हैं, जहाँ भाजपा उम्मीदवार दूसरे नंबर पर रहे थे। इनमें से 11 सीटों पर हार-जीत का अंतर बहुत कम था। सरसरी तौर पर कहा जाए तो 22 बागी विधायकों ने औसतन मात्र 15% वोटों के अंतर से ही जीत दर्ज की थी। सबसे ज्यादा 57,446 वोटों से जीतने वाली डबरा सीट की विधायक इमरती देवी ही थीं। जबकि, सुवासरा के बागी विधायक हरदीपसिंह डंग तो मात्र 350 वोटों से विधानसभा चुनाव जीते थे।
ऐसे में इन विधानसभा सीटों पर यदि भाजपा ने कांग्रेसी बागियों को उपचुनाव में टिकट दिए, तो कई सीटों पर भाजपा में विद्रोह होने की आशंका से इनकार नही किया जा सकता l कुछ भाजपा के पूर्व उम्मीदवार पार्टी की अनसुनी कर मैदान में भी उतर जाएं। क्योंकि, यदि उन्होंने बागी कांग्रेसियों को चुनाव जिताने में मदद की, तो उनकी बरसों की राजनीति हमेशा के लिए ख़त्म हो जाएगी। भाजपा के जो नेता इस बार इन सीटों से उपचुनाव नहीं लड़ पाएंगे, तो वो कभी ऐसा नहीं चाहेंगे कि उनके वोट उस नेता को मिले, जो उनके खिलाफ पिछला चुनाव लड़कर जीता था।
हरिशकर पाराशर, राष्ट्रीय जजंमेंट समाचार सेवा

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